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IAS Topper Tina Dabi Success Story in Hindi




अगर आपको TV और अखबारों से परहेज नहीं होगा तो पिछले दो दिनों में आपने एक नाम ज़रूर सुना या पढ़ा होगा… वो नाम है, “Tina Dabi”.

टीना डाबी दिल्ली की वो लड़की है जिसने India के सबसे prestigious माने जाने वाले civil services exam में TOP किया है। और हैरानी की बात ये है की वो सिर्फ 22 साल की हैं और IAS Officer बनने के लिए ये उनका पहला एटेम्पट था।

लेकिन उससे पहले हम उनके बारे में कुछ और डिटेल्स जान लेते हैं - 


नाम: टीना डाबी
All IndiaRank: 1
Roll No:0256747
उम्र: 22 साल
Civil Services Exam में no. of attempts: 1
चुना गया विषय: Poltical Science / राजनीति शास्त्र
Schooling: Convent of Jesus and Mary School
College: Lady Shri Ram College (दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेजों में से एक)
किस medium से exam और interview दिया: English
Home town/city: Delhi, (बर्थ प्लेस : भोपाल)
क्या CSE के लिए कोई coaching की : हाँ, दिल्ली में की
Service preferences (Top-5): आईएस,आईपीएस,आईएफएस, आईआरएस(आईटी),आईआरएस (सीई)
स्टेट कैडर प्रेफरेंस: हरयाणा

टीना डाबी का Educational Background

Class 10 (सीबीएसई): 90.2% (आर्ट्स सब्जेक्ट)
Class 12 (सीबीएसई): 91.4% (आर्ट्स सब्जेक्ट)
Graduation: Political Science (Eco majors)- 81।5%
Post-graduation:  नहीं किया है
Hobbies & Extracurricular achievements Hobbies:
  • Painting (मधुबनी आर्ट )
  • ट्रेवल करना
  • खेलना
  • गाना
  • बास्केटबॉल
  • Guitar बजाना
  • फोटोग्राफी
  • and reading novels of Jane Austen

Achievements:

  • University gold medal-political science
  • University topper-academic year
  • Best all round student award

Some interesting Facts:

  • टीना के माता-पिता दोनों ही trained Engineers हैं और उन्होंने भी UPSC एग्जाम clear किया हुआ है। माता जी पहले ही voluntary retirement ले चुकी हैं।
  • Tina की एक छोटी बहन हैं, वो भी आगे चल कर IAS officer बनना चाहती हैं।
  • Tina शुरू से ही अपने school और college में topper रही हैं।
  • उनका birth place Bhopal है और अब उनका परिवार Delhi में settled है।

सफलता का श्रेय किसे देती हैं :

अपनी माँ को। माँ ने ही शुरू से उन्हें IAS के लिए inspire किया और preparation में पूरी तरह उनके साथ लगी रहीं। इसलिए Tina कहती हैं, “इस success पे जितना हक़ मेरा है उतना ही मेरी माँ का भी है ”
माँ से पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा, “ Tina ने बहुत -बहुत मेहनत की है …10-10 घंटे पढ़ती रहती थी।।कहना पड़ता था कि बस अब सो जाओ …”
उनकी माँ को उनपर बहुत गर्व है, उनका कहना है –
My daughter- My Hero



Civil Services Exam में सफलता के लिए क्या करना चाहिए:

इस प्रश्न के उत्तर में Tina कहती हैं :
  1. Hard work करते रहिये …there is no substitute to hard work।
  2. हार मत मानिए
  3. Focused approach रखिये
  4. Disciplined रहिये …।सब कुछ छोड़ कर पढाई करिये।
  5. Patience रखिये
  6. Determined रहिये …कोई भी दिन बेकार न जाये।
Tina ने state cadre preference में Haryana का नाम दिया है। जिसके कई कारण हैं, हरयाणा उनके घर यानि दिल्ली से सबसे करीब है, हरयाणा में gender inequality की बड़ी समस्या है जिसे वो address करना चाहती हैं, etc
तो ये तो हो गयी media से की गयी बातें। अब आते हैं main बात पर …

Tina की सफलता का सबसे बड़ा कारण क्या है ?

Tina जब 11th class में थीं तब उन्होंने peer pressure की वजह से Science subjects chose किये थे …पर अपनी माँ के समझाने पर कि तुम्हारा interest humanities subjects में अधिक है और तुम्हे वही पढ़ना चाहिए …टीना ने अपने subject change करा दिए और Arts subjects पढ़ने लगीं।
चूँकि उनके मात -पिता भी civil servants हैं इसलिए घर का माहौल ही कुछ ऐसा रहा होगा कि Tina को ये बात clear थी कि आगे चल कर उन्हें भी UPSC के exam में बैठना है। लिहाजा, वो 11th से ही अपने favourite subject Political Science को पढ़ने लगीं और आगे चल कर civil services exam में भी इसी subject को opt किया।
अपने interview में उन्होंने बताया कि वो कभी भी 8 घंटे से कम नहीं पढ़ीं और बहुत बार 14 -14 घंटे भी पढ़ाई की।
अगर हम उनका average study hours 10 भी मान लें तो ग्यारहवीं से लेकर ग्रेजुएशन तक में ही उन्होंने 5 साल खूब जम कर पढ़ाई की। अगर इसे घंटो में calculate करें तो ये होता है :
5x365x10= 18250 घंटे।
जिसमे से I am quite sure की इन अठारह हज़ार + घंटो में से directly-indirectly कम से कम दस हज़ार घंटे IAS एग्जाम से रिलेटेड चीजें पढने में लगायी होंगी, खासतौर से IAS के अपने optional subject Political Science को उन्होंने ख़ासा time दिया होगा, यही वजह है कि Political science में वो University Gold medalist भी रही हैं।
यानि, उनकी सफलता का सबसे बड़ा कारण है काफी पहले से अपने लक्ष्य का पता होना और उसे पाने के लिए 10000 घंटे से अधिक की कड़ी मेहनत करना।
लेकिन शायद आप सोच रहे हों की बहुत से लोग 100000 या उससे अधिक घंटे पढ़ाई करते हैं पर हर कोई आईएस अफसर नहीं बन पता?
इसका राज छिप है “10000 hour rule” के दो शब्दों में…”deliberate practice” यानि जानबूझ कर अपने काम में महारथ हासिल करने के लिए एफ्फोर्ट्स डालना।
तैयारी बहुत लोग करते हैं पर मुझे लगता है कि जो लोग क्वालीफाई करते हैं वे इस एग्जाम से जुड़े हर एक aspect में खुद को improve करते रहते हैं। फिर चाहे वो लिखने का तरीका हो, subject knowledge  हो, interview की तैयारी हो, हर एक चीज में खुद को पहले से बेहतर बनाते चलते हैं। बहुत से लोग जिस चीज में अच्छे हैं बस उसी को और अच्छा करने में लगे रहते हैं लेकिन qualifiers अपनी weaknesses पर कड़ी मेहनत करते हैं और अपनी strengths को और बेहतर बनाते हैं।
और घंटों पढाई करने पर भी चयनित न होने का एक रीज़न मुझे आईएस श्रेयांश मोहन (रैंक 447) के इन शब्दों में नज़र आता है-
ज्यादा घंटे पढने की बजाए ज्यादा ईमानदारी से पढने की आदत डालें।
सची ही तो है, लोग किताबें तो घंटों लेकर बैठे रहते हैं पर पढ़ते कितना है ये मायने रखता है!
और लक फैक्टर भी कहीं न कहीं अपना role play करता है इसलिए कुछ लोग सब कुछ करने के बावजूद चूक जाते हैं…खैर ऐसे लोगों के लिए ही तो UPSC ने multiple attempts allow कर रखे हैं… so never give up…मंजिल ज़रूर मिलेगी।
दोस्तों, लक्ष्य जितना पहले clear हो जाए उसे पाने की तैयारी भी उतनी पहले से शुरू हो सकती है …और जितनी पहले तैयारी शुरू हो जाती है उतनी ही अधिक हमारे success की probability बढ़ जाती है। इसलिए, आज इस बात में time invest करना कि मैं आज से 5 साल या 10 साल बाद क्या बनना या करना चाहता हूँ …आपको एक advantageous position में डाल सकता है। So, do think about your life…do think about your future…और जब वो picture clear हो जाए तो उसे अपनी मेहनत और अपनी skills से draw करना शुरू कर दीजिये …master-piece बनने में time तो लगता ही है !
All the best!




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कुछ तो लोग कहेंगे क्योंकि इनका काम है सिर्फ कहना !

IAS Motivation 



आईएएस के लिए 
कुछ तो लोग कहेंगे ..क्योंकि इनका काम है सिर्फ कहना


                                  जब हम सिविल सेवा की तैयारी कर रहे होते हैं तो एक समस्या का सामना लगभग सभी करते हैं ..वह है लोगों के कमेंट्स ..!! . तैयारी के दौरान बहुत से लोग आपसे कहेंगे कि आईएएस कोई बच्चों का खेल नहीं , कोई कहेगा कि गांव वाले आईएएस नहीं बन पाते , कोई कहेगा कि आईएएस के लिए दिल्ली जाकर कोचिंग कीजिये . घर पर बैठकर कोई कलेक्टर नहीं बनता ....और भी जाने कितने तरह के लोग और कितनी तरह की बातें ..और सबसे आश्चर्य वाली बात यह है कि इनकी बातें लगातार सुनकर ही लगभग 75 % लोग दिग्भ्रमित हो जाते हैं आखिर क्यों ..? ..एक बात बताइए आईएएस का सपना किसका है .. आपका या उनका ..? .., आईएएस बनने के लिए परिश्रम किसको करना पड़ेगा ..आपको या उनको ..? .., आईएएस बनने के बाद किसके नाम के आगे आईएएस लिखा जायेगा ..आपके या उनके .. ? ..और अगर आप आईएएस नहीं बन पाए तो क्या ये लोग आकर आपसे कहेंगे कि माफ़ करना मेरी वजह से तुम्हारा सपना पूरा नहीं हो पाया ..? ..नहीं ना ......!! आपके साथ अच्छा हो या बुरा सबका सामना आपको अकेले ही करना है तो फिर अपने मन और मस्तिष्क की क्यों नहीं सुनते ..? ..क्यों अपने भाग्य का ठेका लोगों कि बातों पर डाल रखा है .. क्या इनकी बातें तय करेंगी कि आप क्या बन सकते हो और क्या नहीं ..? .


बचपन में एक कहानी सुनी थी पर उसके सही मायने आज समझ में आएं हैं ..
"" एक आदमी और उसका बेटा एक गधा खरीदकर पैदल जा रहे थे .वो एक गांव से गुजरते हैं तो लोग कहते हैं कि देखो कितने मुर्ख हैं साथ में इतना हट्टा कट्टा गधा लिए हैं और पैदल जा रहे हैं , दोनों ने सोचा फिर दोनों गधे पर बैठ गए ...अब दूसरे गांव पहुंचे तो लोग कहते हैं कि देखो इनको बेचारे गधे की जान निकाले ले रहे हैं दोनों बाप बेटा एक ही गधे पर लदे हैं ... !! ...दोनों ने फिर सोचा फिर बाप कहता है कि बेटा तू बैठा रह और बाप पैदल चलने लगता है अब तीसरे गांव में पहुंचते हैं तो लोग कहते हैं देखो बूढा बाप पैदल चल रहा है और बेटा बैठा है ...फिर बेटा नीचे आ जाता है और बाप को बैठा देता है ..अब अगले गांव पहुँचते हैं तो लोग कहते हैं कि देखो हट्टा कट्टा बाप गधे पर लदा है और छोटे से बच्चे को धूप में पैदल चला रहा है ""
 ...आशा है आप सब समझ गए होंगे .... !!
मेरा सिर्फ इतना कहना है कि लोग तो तब भी कहेंगे जब आप कुछ नहीं करेंगे तो इससे अच्छा है कुछ कीजिये ..! .....लोगों कि नहीं अपने मन और मस्तिष्क कि सुनिए और वही कीजिये जो आपका दिल कहता है , वो नहीं जो लोग कहते हैं ...!!
....
आपका अपना शरद तिवारी "" निःशब्द ""
आईएएस के लिए 

साभार - शरद तिवारी सर (निःशब्द)




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IAS - Roman Saini - Motivational Hindi Story





उन्होंने मात्र 16 वर्ष की उम्र में मेडिकल की परीक्षा उत्तीर्ण की और विश्वप्रसिद्ध अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान (एआईआईएमएस) में एक जूनियर रेजीडेंट डाॅक्टर के रूप में काम करने लगे। वे सिर्फ यहीं पर नहीं रुके और 22 वर्ष की उम्र में इन्होंने प्रतिष्ठित सिविल सेवाओं की परीक्षा को भी सफलतापूर्वक पार किया और एक आईएएस अधिकारी बन गए। और अब वे अपने उद्यमशीलता के प्रयास के माध्यम से समाज को वह सबकुछ वापस देने का प्रयास कर रहे हैं और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा में बठने के इच्छुक युवाओं को निःशुल्क आॅनलाइन प्रशिक्षण उपलब्ध करवा रहे हैं।

मिलिये रोमन सैनी से। वे आज के उस आधुनिक भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सीमाओं से परे जा रहा हैं और सिर्फ योग्यता को मूल आधार मानते हुए सिर्फ दृढ़संकल्प से भरे हुए लोगों के लिये सबकुछ संभव बना रहा है।

रोमन कहते हैं, ‘‘मेरा ऐसा विश्वास है कि अगर हम वास्तव में कुछ किसी चीज को पाने की ठान लें तो हमारे लिये कुछ भी असंभव नहीं है। मैंने अपने लिये जीवन में पाने केभी लिये कोई बाहरी मानदंड तय नहीं किये। मैंने हमेशा से ही अपने मन की सुनी है और वह किया ह जो मुझे पसंद है। मैं गिटार सिर्फ इसलिये बजाता हूँ क्योंकि मुझे संगीत से प्यार है इसलिये नहीं कि मेरी ख्वाहिश इंग्लैंड के ट्रिनिटी काॅलेज में जाने की है। मेडिकल, सिविल सेवा और अब आॅनलाइन सामग्री के माध्यम से यूपीएससी की परीक्षा पास करने की उम्मीद रखने वाले लाखों लोगों की मदद करना-यह सबकुछ मेरी अंर्तरात्मा की आवाज है।’’


ऐसा हो भी क्यों ना? जयपुर के एक मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले रोमन अपने जीवन के सभी सपनों को पूरा करने में सिर्फ इसलिये सफल रहे क्योंकि उन्होंने जो भी किया वह पूरी तरह से दिल लगाकर किया। रोमन कहते हैं, ‘‘मेरे माता-पिता ने मुझे बहुत छोटी उम्र में ही मेरे हाल पर छोड़ दिया था क्योंकि मैं उनके साथ सामाजिक आयोजनों में नहीं आता-जाता था। यहां तक कि काफी लंबे समय तक मैं किसी पारिवारिक विवाह समारोह का हिस्सा नहीं बना। मेरे संपर्क में आने वाले रिश्तेदारों और मित्रों को अहसास हुआ कि मैं औरों से अलग हूँ, उनकी नजरों में शायद कुछ अजीब। और शायद वे काफी हद तक सही भी थे। मैं अपनी ही दुनिया में खोया रहता था और अपनी पसंद के काम करता था। मैं अपने जीवन में कहीं न कहीं जरूरी और गैरजरूरी के बीच के अंतर को पहचानने की क्षमता विकसित कर चुका था। इसी वजह से मैं अपने जीवन में ठीक कामों को सही तरीके से करने में सफल रहा।’’


‘‘स्कूल के दिनों में मेरी दिलचस्पी पढ़ाई में बिल्कुल भी नहीं थी और मैं एक बिल्कुल सामान्य छात्र था जिसे मेधावी तो बिल्कुल भी नहीं कह सकते थे। मेरा मत है कि स्कूल इत्यादि में उच्च अंक लाना बिल्कुल अनावश्यक है। मैं स्कूलों और काॅलेजों में सिर्फ परीक्षा को उत्तीर्ण करने वाली शिक्षा प्रणाली के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं हूँ। मैं मेडिकल की परीक्षा में सिर्फ इसलिये बैठा क्योंकि जीव विज्ञान ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा था और उससे संबंधित कुछ भी पढ़ना मुझे बेहद पसंद था। मुझे इसके काफी मजा आया और मैंने ऐसे ही परीक्षा भी दी। एआईआईएमएस के लिये चयनित होना विषय के प्रति मेरी रुची का ही एक बेहतरीन परिणाम था। इसी प्रकार यूपीएससी के दौरान भी मैंने सिर्फ विषयों का आनंद लेने की अपनी सहज-प्रवृत्ति का पालन किया।’’



आज रोमन अपनी उपलब्धियों को हर किसी के साथ साझा करना वाहते हैं। वे चाहते हैं कि हर कोई ऐसा करने में सक्षम हो जैसा उन्होंने किया है और उनका उद्यम इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। वे कहते हैं, ‘‘मैंने यूपीएससी की परीक्षा के हौव्वे को लोगों को दिलो-दिमाग से उतारने के लिये यह आॅनलाइन कार्यक्रम शुरू किया है। अगर आप इसे अच्दे तरीके से समझने में कामयाब रहें तो कोई भी इस वैतरणी को पार कर सकता है। ध्यान रखिये कि यह दुनिया की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक है और जबतक आप अपने लिये निर्धारित लक्ष्य को प्यार नहीं करेंगे तबतक आप इसमें सफल नहीं हो सकते। आप इस परीक्षा को शक्ति, पैसे और पद के प्रवेश द्वार की तरह देखकर बिल्कुल भी न दें बल्कि सिर्फ इसलिये दें क्योंकि यह आपके जीवन के लिये एक वास्तविक अर्थ रखती है। यह एक कठिन प्रक्रिया है और यह आपकी मानसिक शक्ति का जैसी परीक्षण करती है वैसी और कोई परीक्षा नहीं लेती। किसी भी चुनौतीपूर्ण और कठिन पल में सिर्फ आपकी अंतरात्मा की आवाज ही आपको मार्गदर्शन देने वाली शक्ति होगी।’’

‘‘लगातार कुछ नया सीखने की जुस्तजू मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। चाहे जो भी स्थिति-परिस्थिति हो, मैं प्रत्येक क्षण हर किसी से कुछ न कुछ सीखता रहता हूँ। मैं सिर्फ ज्ञान का भूखा हूँ नई जानकारी लेने के लिये मैं कभी भी शर्म नहीं करता। यही भावना मुझे आगे बढ़ने में सहायता देती है।’’ रोमन इस बात से बहुत अधिक रोमांचित हैं कि एक आईएएस के तौर पर वे ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने में सफल रहेंगे और वहां के लोगों की समस्याओं से रूबरू होकर उनका समाधान करने में एक भूमिका निभा सकेंगे।





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स्वामी विवेकानंद के जीवन के 3 प्रेरक प्रसंग (3 Motivational Context of the Life of Swami Vivekananda in Hindi)




1.लक्ष्य पर ध्यान लगाओ

स्वामी विवेकानंद अमेरिका में भ्रमण कर रहे थे . एक जगह से गुजरते हुए उन्होंने पुल पर खड़े  कुछ लड़कों को नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बन्दूक से निशाना लगाते देखा . किसी भी लड़के का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था . तब उन्होंने ने एक लड़के से बन्दूक ली और खुद निशाना लगाने लगे . उन्होंने पहला निशाना लगाया और वो बिलकुल सही लगा ….. फिर एक के बाद एक उन्होंने कुल 12 निशाने लगाये और सभी बिलकुल सटीक लगे . ये देख लड़के दंग रह गए और उनसे पुछा , ” भला आप ये कैसे कर लेते हैं ?”

स्वामी जी बोले , “तुम जो भी कर रहे हो अपना पूरा दिमाग उसी एक काम में लगाओ. अगर तुम निशाना लगा रहे हो तो तम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर होना चाहिए. तब तुम कभी चूकोगे नहीं . अगर तुम अपना पाठ पढ़ रहे हो तो सिर्फ पाठ के बारे में सोचो . मेरे देश में बच्चों को ये करना सिखाया जाता है. ”
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2.डर का सामना 

एक बार बनारस में स्वामी जी दुर्गा जी के मंदिर से निकल रहे थे की तभी वहां मौजूद  बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया. वे उनके नज़दीक आने लगे और डराने लगे . स्वामी जी भयभीत हो गए और खुद को बचाने के लिए दौड़ कर भागने लगे, पर बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए, और वे उन्हें दौडाने लगे. पास खड़ा एक वृद्ध सन्यासी ये सब देख रहा था , उसने स्वामी जी को रोका और बोला , ” रुको ! उनका सामना करो !”
स्वामी जी तुरन्त पलटे  और बंदरों के तरफ बढ़ने लगे , ऐसा करते ही सभी बन्दर भाग गए . इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली और कई सालों बाद उन्होंने एक संबोधन में कहा भी – ” यदि तुम कभी किसी चीज से भयभीत हो तो उससे भागो मत , पलटो और सामना करो.”
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3.सच बोलने की हिम्मत

स्वामी विवेकानंदा प्रारंभ से ही एक मेधावी छात्र थे और सभी उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित  रहते थे. जब वो साथी छात्रों से कुछ बताते तो सब मंत्रमुग्ध हो उन्हें सुनते. एक दिन इंटरवल के दौरान वो कक्षा में कुछ मित्रों को कहानी सुना रहे थे , सभी उनकी बातें सुनने में इतने मग्न थे की उन्हें पता ही नहीं चला की कब मास्टर जी कक्षा में आये और पढ़ाना शुरू कर दिया.
मास्टर जी ने अभी पढ़ना शुरू ही किया था कि उन्हें कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी.
” कौन बात कर रहा है ?” उन्होंने तेज आवाज़ में पूछा . सभी ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों किई तरफ इशारा कर दिया.
मास्टर जी  तुरंत क्रोधित हो गए, उन्होंने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और  पाठ से संबधित एक प्रश्न पूछने लगे. जब कोई भी उत्तर न दे सका ,तब अंत में मास्टर जी ने  स्वामी जी से भी वही प्रश्न किया . पर स्वामी जी तो मानो सब कुछ पहले से ही जानते हों , उन्होंने आसानी से उत्तर दे दिया.
यह देख उन्हें यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बात-चीत में लगे हुए थे. फिर क्या था उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी . सभी छात्र एक -एक कर बेच पर खड़े होने लगे, स्वामी जे ने भी यही किया.
तब मास्टर जी बोले, ” नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद )) तुम बैठ जाओ.”
” नहीं सर , मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि वो मैं ही था जो इन छात्रों से बात कर रहा था.”,स्वामी जी ने आग्रह किया.
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रिक्शेबाले का बेटा बना IAS Officer (An IAS Success Story in Hindi)





अगर  career के  point of view से  देखा  जाए  तो India  में  थ्री आइज़ (3 Is) का   कोई  मुकाबला  नही:
IIT,IIM, और IAS. लेकिन इन तीनो  में  IAS का  रुतबा  सबसे  अधिक  है . हर  साल  लाखों  परीक्षार्थी  IAS officer बनने  की  चाह  में  Civil Services के  exam में  बैठते  हैं  पर  इनमे  से 0.025 percent से  भी  कम  लोग  IAS officer बन  पाते  हैं . आप  आसानी  से  अंदाज़ा  लगा  सकते  हैं  कि  IAS beat करना  कितना  मुश्किल  काम है , और ऐसे  में  जो  कोई  भी  इस  exam को  clear करता  है  उसके  लिए  अपने  आप  ही  मन  में  एक  अलग  image बन  जाती  है . और  जब  ऐसा  करने  वाला  किसी  बहुत  ही  साधारण  background से  हो  तो  उसके  लिए  मन  में  और  भी  respect आना  स्वाभाविक  है .

आज   मैं  आपके  साथ  ऐसे  ही  एक  व्यक्ति की  कहानी  share  कर  रहा  हूँ  जो  हज़ारो  दिक्कतों  के  बावजूद  अपने  दृढ  निश्चय  और  मेहनत  के  बल  पर  IAS officer बना .
ये  कहानी  है  Govind Jaiswal की , गोविन्द   के  पिता  एक  रिक्शा -चालक  थे , बनारस  की  तंग  गलियों  में  , एक  12 by 8 के  किराए  के  कमरे  में  रहने  वाला  गोविन्द  का  परिवार  बड़ी  मुश्किल  से  अपना  गुजरा  कर  पाता  था . ऊपर से  ये  कमरा  ऐसी  जगह  था  जहाँ  शोर -गुल  की कोई  कमी  नहीं  थी , अगल-बगल  मौजूद  फक्ट्रियों  और  जनरेटरों  के  शोर  में  एक  दूसरे  से  बात  करना  भी  मुश्किल  था .
नहाने -धोने  से  लेकर  खाने -पीने  तक  का  सारा  काम इसी  छोटी  सी जगह  में  Govind , उनके  माता -पिता  और  दो  बहने  करती  थीं . पर  ऐसी  परिस्थिति  में  भी  गोविन्द  ने  शुरू  से  पढाई  पर  पूरा  ध्यान  दिया .

अपनी  पढाई  और  किताबों  का  खर्चा  निकालने  के  लिए  वो   class 8 से  ही  tuition पढ़ाने  लगे . बचपन  से  एक  असैक्षिक  माहौल  में  रहने  वाले  गोविन्द  को  पढाई  लिखाई   करने  पर  लोगों  के  ताने  सुनने पड़ते  थे . “ चाहे  तुम  जितना  पढ़ लो  चलाना  तो  रिक्शा  ही  है ” पर  गोविन्द  इन  सब  के  बावजूद  पढाई  में  जुटे  रहते . उनका  कहना  है . “ मुझे  divert करना  असंभव था .अगर  कोई  मुझे  demoralize करता  तो  मैं  अपनी  struggling family के  बारे  में  सोचने  लगता .”

आस - पास  के  शोर  से  बचने  के  लिए  वो  अपने  कानो  में  रुई लगा  लेते  , और  ऐसे  वक़्त  जब  disturbance ज्यादा  होती  तब  Maths लगाते  , और  जब  कुछ  शांती  होती  तो  अन्य  subjects पढ़ते .रात में  पढाई के लिए अक्सर उन्हें मोमबत्ती, ढेबरी , इत्यादि का सहारा लेना पड़ता क्योंकि उनके इलाके में १२-१४ घंटे बिजली कटौती रहती.


चूँकि   वो  शुरू  से  school topper रहे  थे  और  Science subjects में  काफी  तेज  थे  इसलिए   Class 12 के  बाद  कई  लोगों  ने  उन्हें  Engineering करने  की  सलाह  दी ,. उनके  मन  में  भी  एक  बार  यह विचार  आया , लेकिन  जब  पता  चला  की  Application form की  fees ही  500 रुपये  है  तो  उन्होंने  ये  idea drop कर  दिया , और  BHU से  अपनी  graduation करने  लगे , जहाँ  सिर्फ  10 रूपये की औपचारिक fees थी .
Govind अपने  IAS अफसर बनने  के  सपने  को  साकार  करने  के  लिए  पढ़ाई  कर  रहे  थे  और  final preparation के  लिए  Delhi चले  गए  लेकिन  उसी  दौरान   उनके  पिता  के  पैरों  में  एक  गहरा  घाव  हो  गया  और  वो  बेरोजगार  हो  गए . ऐसे  में  परिवार  ने  अपनी  एक  मात्र  सम्पत्ती  , एक  छोटी  सी  जमीन  को  30,000 रुपये  में  बेच  दिया  ताकि  Govind अपनी  coaching पूरी  कर  सके . और  Govind ने  भी  उन्हें  निराश  नहीं  किया , 24 साल  की  उम्र  में  अपने  पहले  ही attempt में (Year 2006)  474 सफल  candidates में  48 वाँ  स्थान  लाकर  उन्होंने  अपनी  और  अपने  परिवार  की  ज़िन्दगी  हमेशा -हमेशा  के  लिए  बदल  दी .
Maths पर  command होने  के  बावजूद  उन्होंने  mains के  लिए  Philosophy और  History choose किया , और  प्रारंभ  से  इनका  अध्यन  किया ,उनका कहना  है  कि , “ इस  दुनिया  में  कोई  भी  subject कठिन  नहीं  है , बस आपके  अनादर  उसे  crack करने  की  will-power होनी  चाहिए .”
अंग्रेजी  का  अधिक  ज्ञान  ना  होने पर  उनका  कहना  था , “ भाषा  कोई  परेशानी  नहीं  है , बस  आत्मव्श्वास  की ज़रुरत  है . मेरी  हिंदी  में  पढने  और  व्यक्त  करने  की  क्षमता  ने  मुझे  achiever बनाया .अगर  आप  अपने  विचार  व्यक्त  करने  में  confident हैं  तो  कोई  भी  आपको  सफल  होने  से  नहीं  रोक  सकता .कोई  भी  भाषा  inferior या  superior नहीं  होती . ये  महज  society द्वारा  बनाया  गया  एक  perception है .भाषा  सीखना  कोई  बड़ी  बात  नहीं  है - खुद  पर  भरोसा  रखो . पहले  मैं  सिर्फ  हिंदी  जानता  था ,IAS academy में  मैंने  English पर  अपनी  पकड़  मजबूत  की . हमारी  दुनिया  horizontal है —ये  तो  लोगों  का  perception है  जो  इसे  vertical बनता  है , और  वो  किसी  को  inferior तो  किसी  को  superior बना  देते  हैं .”
गोविन्द  जी  की  यह  सफलता  दर्शाती  है  की - " कितने  ही  आभाव  क्यों  ना  हो  यदि  दृढ  संकल्प  और  कड़ी मेहनत   से  कोई  अपने  लक्ष्य -प्राप्ति  में  जुट  जाए  तो  उसे  सफलता  ज़रूर  मिलती  है " आज  उन्हें  IAS officer बने  9 साल  हो  चुके  हैं  पर  उनके  संघर्ष  की  कहानी  हमेशा  हमें प्रेरित  करती  रहेगी .
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दृंढ निश्चय (Strong Determination) - Hindi Motivational Story



हरीश एक गाँव का पला बढ़ा इंसान था। मन में आगे बढ़ने की उमंग थी, कुछ अच्छा करने का उत्साह था तो घर वालों से जिद करके पढाई(High Education in College) के लिए शहर चला गया। हरीश यूँ तो शुरुआत से ही अव्वल दर्जे का छात्र रहा था, कॉलेज से भी अच्छे नंबरों से पास हुआ। एक अच्छी कंपनी में नौकरी(Job) भी मिल गयी थी। करीब 4-5 साल बाद हरीश गाँव लौटा तो देखा आज भी लोगों में वही प्यार और स्नेह की भावना थी।

गाँव के लोग हरीश इंजिनियर बाबू(Engineer) कहकर बुलाते थे, ये सुनकर हरीश कहीं ना कहीं मन में सम्मान महसूस करता था। कुछ दिन गाँव में रहा तो हरीश को किसी ने बताया कि गाँव में कोई साधु बाबा आये हैं वो जब भी नाचते हैं बारिश होने लगती है। सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ, हँसी भी आई, हरीश विज्ञानं का छात्र था और वो जानता था कि ऐसा कोई जादू संभव ही नहीं है। उसे लगा कि ये बाबा भोले गाँव वालों को बेवकूफ बना रहा है। यही सोचकर वह बाबा से मिलने गया।


हरीश ने जाकर बाबा को चेलेंज कर दिया कि आपके पास कोई जादू नहीं है, अगर आपके नाचने से बारिश हो सकती है तो मेरे नाचने से भी जरूर होगी। कुछ गाँव वाले भी देखने के लिए इकट्ठे हो गए। हरीश ने नाचना शुरू किया, नाचते हुए बार बार आसमान की ओर देखता लेकिन बारिश नहीं हुई, हरीश थोड़ी देर में ही थककर चूर हो गया। अब बाबा की बारी थी। बाबा ने नाचना शुरू किया, और नाचते ही रहे घंटों बहुत देर तक, अभी तक बारिश नहीं हुई थी। बाबा भी लगातार नाचे जा रहा था, काफी देर बाद आसमान में बादल छाने लगे, बाबा नाचते हुए थका नहीं बल्कि घंटो नाचता रहा। कुछ देर बाद बादल जमकर बरसे, घनघोर बारिश हुई।



हरीश शर्म से सर झुकाकर बाबा से इस जादू के बारे में पूछने लगा। बाबा ने कहा- बेटा ये कोई जादू नहीं है, नाहीं ये कोई कला है, ये तो बस एक दृंढ निश्चय है। मैं जब भी नाचता हूँ तो दो बात का ध्यान रखता हूँ। पहला मैं मन में खुद को विश्वास दिलाता हूँ कि अगर मैं नाचूँगा तो बारिश जरूर होगी और दूसरा अगर बारिश नहीं हुई तो मैं जब तक नाचूँगा, तब तक बारिश ना हो जाये। बस यही इस बारिश और नाच का राज है।



हरीश को अपनी सारी डिग्रियाँ आज इस ज्ञान के आगे कमजोर नजर आ रहीं थी। विज्ञानं(Science) की किताबें तो बहुत पढ़ी पर जीवन के इस अनमोल ज्ञान का अनुभव पहले कभी नहीं किया था।



मित्रों आप भी जब कोई नए काम की शुरुआत करें तो मन में खुद पे विश्वास रखें कि आप सफल जरूर होंगे और सफल नहीं हुए तो तब तक प्रयास करते रहेंगे जब तक सफल हो ना जाएँ। बस यही हर सफलता का मन्त्र है। कोई काम असंभव नहीं है आपकी सोच और प्रयास से ही असंभव को संभव किया जा सकता है।





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